ग्रीष्म की प्रचंड तपिश में,
आसमान की ओर निहारता गुलमोहर!
गांव- शहर- कानन में,
लहकता प्रणम्य डालियों संग!
दे रहा हृदय से ईश को धन्यवाद।
कि हे भगवन तुमने मुझे!
सहनशक्ति संग दी धैर्यता।
तभी तो दिवाकर की अग्नि को,
सहजता से स्वीकार कर रहा हूं।
अपने लाल तो कहीं नारंगी रंग से,
दूर से ही अपनी पहचान दे रहा हूं।
मुझे देख बढ़ते हैं थके पथिक के कदम,
तीव्रतम गति से मेरी ओर!
मैं गुलमोहर केवल एक वृक्ष नहीं!!!!!
तनिक देर के लिए ही सही,
पर मानुष को आशियाना सम!
शांत शीतल छांव देता हूं।
संगअपनी किस्मत पर फक्र कर,
ईश्वर तुझे हर दिन प्रणाम करता हूं।
कि तूने मुझे सदा किया सिंचित,
अपनी वर्षा की एक-एक बूंद से।
मूल से पर्ण-पर्ण तक……
दी मुझको असीम ताकत,
तभी तो झुलसाती गर्मी में,
इस धरा पर औरों के सुख की खातिर!!
हर वर्ष अपने को विस्तृत करता हुआ,
लहलहाकर उपकारी बन मुस्कुराता हूं।
-सीता गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
