इंसानों को देखा है

मैने जानवरों को ठंड से कांपते देखा है,
कुचल दिए जाते हैं सड़कों पर,
उन्हें रोते, बिलखते,आंसू बहाते देखा है,
उनके दुख को नजर अंदाज करके,
इंसानों को चैन से सोते देखा है,
जंगलों में आग लगते,
पेड़ों को कटते देखा है,
पर, भरपूर ऑक्सीजन लेकर,
इंसानों को सांस भरते देखा है,
रोड पर कचरा,
दीवारों पर थूकते देखा है,
“एक के सफाई करने से क्या होगा?” कहकर,
इंसानों को रास्ता नापते देखा है,
कईयों को डूबते देखा है, मदद करने के बजाय,
हैवानों को फोटो, वीडियो बनाते देखा है,
नर्क मैने कहीं देखा नहीं, पर,
नर्क के शैतानों को रोड पर घूमते, टहलते देखा है।

-प्रणव राज
कैमूर (बिहार)

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