दिखावे की दुनिया में वास्तव में,
इंसान अपनी असली पहचान खो रहा।
दुनिया सिमट गई हाथों में,
पर संवाद जो हो रहे मूक।
जिससे दिलों की छत,
हो रही अंबर के क्षितिज सम।
तो धरा पर मृगतृष्णा सी,
जहाॅं रिश्तों में जगह ख़ाली सी।
बस!अब तो दृश्य परिलक्षित,
आधुनिक भौतिकवादी मनुज,
रहा है लगातार दौड़।
बात-बेबात लगा रहा कई जगह,
न जाने क्यों होड़।
कर रहा जैसे खुद से छलावा।
तो देख ले मानुष स्व आंखों,
तू क्या चाहता था क्या पा रहा!
-सीता गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
