यहाँ इल्ज़ाम पहले तय, सफ़ाई बाद में हैं सुनते,
अदालत से पहले फ़ैसले अक्सर दरबार लिखते हैं।
नज़र झुकती नहीं मेरी किसी सोने की चौखट पर,
मेरे उसूल ही मेरी अलग सरकार लिखते हैं।
हवा के साथ बहने का हुनर जिनको मुबारक हो,
हम अपनी ज़िद से मौसम का नया किरदार लिखते हैं।
क़लम बिकती नहीं मेरी, न झुकती है किसी डर से,
हम अपने ख़ून से इतिहास के अशआर लिखते हैं।
-विनीत कुमार राय
