जब विगत स्मृतियाँ हौले से
आँगन में घिर घिर आतीं हैं
साँकल खिसका कर अंतस की
जब बिखर धूप सी जाती हैं
वह कभी जलाती भीतर तक
बन जाती कभी सहारा हैं
यादों को सजा करीने से
इस मन को आज बुहारा है
बरसों से थे जो दबे पड़े
इच्छाएँ डर उजड़े सपने
वह सारी अनचाही पीड़ा
जो देते रहे सभी अपने
हर उस बेमतलब बंधन से
अपने को आज उबारा है
यादों को सजा करीने से
इस मन को आज बुहारा है
पाला था जिनको बरसों से
हमने आँखों की पुतली सा
क्यों हमको वे सब छोड़ गए
ना शेष बचा कुछ अपना सा
उन सब आभासों से हमने
अब थक कर किया किनारा है
यादों को सजा करीने से
इस मन को आज बुहारा है
-सरस दरबारी
