रमेश और सुरेश दोनों ही भाई और दोनों ही सरकारी नौकरी में।
एक ही शहर में काम, मगर दोनों का आवास अलग-अलग।
दोनों परिवार के साथ रहकर बच्चों को बाहर के शहरों में तकनीकी शिक्षा के लिए भेज रख्खा था।
समय गुजरता गया।
बच्चों की भी शिक्षा पूरी हो चुकी थीऔर वे भी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम पकड़ चुके थे।
बच्चों की नौकरी लग जाने से दोनों भाईयों के परिवार में शांति और खुशियाँ घर कर गईं।
पांच साल और कैसे निकल गया वो पता ही नहीं चला।
बच्चों की शादी के लिए रिश्तेदार भी आ जा रहे थे।
दूसरीओर ईश्वर की लीला कुछ और चल रही थी।
अचानक एक दिन बड़ा भाई रमेश ने सुरेश को अपने घर आने को कहा।
सुरेश तुरंत बड़े भाई से जा मिला।
सुरेश को देखते सुरेश की भाभी रोने लगी।
सुरेश ने भाभी से रोने का कारण पूछा।
दिल में हिम्मत रख फिर बड़े भाई रमेश ने कहा।
इधर कुछ दिनों से मुझे पेट में दर्द हो रहा था।
दवाई खाकर दर्द को झेलता रहा।
थक हार कल मैंने राजधानी के बड़े डॉक्टर से दिखा आया हूँ।
मेरे आंत में कैंसर हो गया है और मैं कुछ दिनों का ही मेहमान हूँ।
मैने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि मेरे न रहने पर तुम मेरे परिवार की समस्याओं के निदान में हाथ बंटाना।
मैं अपना उत्तरदायित्व तुम्हें सौंप रहा हूँ।
कांपते हाथों से सुरेश ने बड़े भाई का हाथ पकड़ा और कहा।
आपने जो उत्तरदायित्व मुझे सौंपा उसे आशीर्वाद समझ ले रहा हूँ भैया।
ईश्वर को यही मंजूर है तो मैं संकल्प लेता हूँ कि भाभी माँ और बच्चों को किसी भी परेशानी में नहीं आने दूंगा।
-अजय पाण्डेय बेबस
