रात के ग्यारह बज रहे थे। रोहन की उंगलियाँ लैपटॉप के कीबोर्ड पर जमी थीं, पर स्क्रीन पर कर्सर वैसे ही झपक रहा था। सामने दो ईमेल खुले थे।
पहला ईमेल बेंगलुरु की उस बड़ी कंपनी का था। सैलरी तीन गुना, नया पद, और वह सपना जिसे उसने कॉलेज से पाला था।
दूसरा ईमेल पापा का था। सिर्फ दो लाइन: “बेटा, माँ की तबियत फिर से बिगड़ रही है। डॉक्टर ने कहा है घर पर किसी का रहना जरूरी है। तू देख ले।”
रोहन के दोस्त कहते थे, “करियर पहले, माँ-बाप समझ जाएंगे।” उसका मन कहता था, “पैसा फिर कमा लूंगा, पर समय नहीं लौटेगा।”
उसकी उलझन सिर्फ नौकरी की नहीं थी। उलझन यह थी कि सही क्या है। जो दुनिया सही कहती है, या जो उसे सही लगता है।
उसने खिड़की खोली। हल्की बारिश थी। सामने वाली गली में एक बूढ़ा आदमी अपनी दुकान का शटर गिरा रहा था। दुकान छोटी थी, पर उस आदमी के चेहरे पर थकान नहीं, एक अजीब सा सुकून था।
रोहन को दादी की कही बात याद आई: “बेटा, उलझन तब होती है जब हम दिमाग और दिल को अलग-अलग कमरों में बंद कर देते हैं। दरवाजा खोल, दोनों को बात करने दे।”
उसने आँख बंद की। दिमाग ने तर्क दिए: करियर, ग्रोथ, फ्यूचर। दिल ने सिर्फ एक तस्वीर दिखाई: माँ का हाथ उसके सिर पर।
आधी रात को उसने दोनों ईमेल का जवाब नहीं दिया। उसने एक तीसरा मेल लिखा। बेंगलुरु वाली कंपनी को।
“धन्यवाद आपके ऑफर के लिए। मैं इस समय इसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हूँ। क्या हम छह महीने बाद इस पर बात कर सकते हैं? अगर नहीं, तो मैं समझूंगा।”
सेंड बटन दबाते ही उसका दिल जोर से धड़का। उलझन खत्म नहीं हुई थी। डर अभी भी था। पर एक अजीब सी शांति भी थी।
सुबह पापा का फोन आया। “मेल की जरूरत नहीं थी बेटा। तू आ जा, बस।”
रोहन ने बैग पैक किया। उसे नहीं पता था कि उसने सही किया या गलत। पर पहली बार कई दिनों में वह बिना उलझे सोया था।
-मंजू सरावगी ‘मंजरी’
रायपुर (छत्तीसगढ़)

1 कमेंट
ऐसा संस्कार विरले ही देखने को मिलता है। 👌