उलझन

रीमा खिड़की के पास बैठी दूर आसमान को निहार रही थी। बारहवीं की परीक्षा में अच्छे अंक आने के बाद भी उसका मन प्रसन्न नहीं था। परिवार चाहता था कि वह डॉक्टर बने, जबकि उसका मन साहित्य और लेखन की दुनिया में रमता था।
दिन-ब-दिन उसकी उलझन बढ़ती जा रही थी। एक ओर माता-पिता की अपेक्षाएँ थीं, दूसरी ओर उसके अपने सपने। वह किसी का दिल भी नहीं दुखाना चाहती थी और अपने मन की आवाज़ को भी अनसुना नहीं कर सकती थी।
एक दिन उसकी हिंदी शिक्षिका ने उसकी उदासी भाँप ली। कारण जानने पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “जीवन में सबसे कठिन काम सही रास्ता चुनना नहीं, बल्कि अपनी पहचान को समझना होता है। दूसरों की इच्छा पूरी करके सफलता मिल सकती है, लेकिन संतोष नहीं।”
शिक्षिका की बात रीमा के मन में उतर गई। उसने साहस जुटाकर अपने माता-पिता से खुलकर बात की। पहले तो वे नाराज़ हुए, पर जब उन्होंने रीमा की आँखों में अपने सपनों के प्रति सच्चा उत्साह देखा, तो उनका मन बदल गया।
कुछ वर्षों बाद रीमा एक प्रसिद्ध लेखिका बनी। एक साहित्यिक समारोह में सम्मान प्राप्त करते समय उसे अपनी पुरानी उलझन याद आई। वह मुस्कुराई और मन ही मन बोली— “उलझनें रास्ता रोकने नहीं आतीं, वे हमें स्वयं तक पहुँचाने आती हैं।”
संदेश:- जीवन की कई उलझनों का समाधान बाहर नहीं, हमारे अपने अंतर्मन में छिपा होता है। जब हम स्वयं को समझ लेते हैं, तो सही निर्णय का मार्ग भी स्पष्ट हो जाता है।

-डॉ संगीता बिंदल

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