एक आम पुरुष

वो
एक आम पुरुष था,
जिम्मेदारियों की गठरी ढोता हुआ
कभी-कभी मुस्कराता
कभी निःशब्द-सा।

उसकी ज़िंदगी में
सब कुछ था
समर्पण, समझौते, स्थिरता।

फिर भी, भीड़ में कभी-कभार
कोई सामान्य-सी स्त्री
बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कॉलोनी के पार्क में
रोज़ टहलती परिचित-सी अपरिचिता
ठहर जाती थी उसकी आँखों में
बिना किसी कारण,
बिना किसी आमंत्रण।

ना कोई योजना थी,
ना चाहत,
ना ही कोई नीयत।
बस कुछ पल की बातें
कुछ मुस्कानों की अदला-बदली
और दोनों एक-दूजे की हँसी में
हल्का-सा पिघल जाते।

फिर भी कुछ था
उद्दाम आकर्षण का वेग सा
बिन बुलाए पास आ बैठता,
जैसे कोई भूला हुआ सुर
कानों के पीछे अचानक गूंज उठे।

ना प्रेम था,
ना कोई इरादा।
बस संवाद की चाह ने
बुन ली कुछ नज़दीकियाँ
कि वो एक बार देख ले,
हल्के से मुस्करा दे,
और दिन कुछ ज़्यादा सुंदर हो जाए।

उफ़…
दिल के किसी सॉफ्टवेयर ने
कुछ क्षण के लिए
उसे प्रायोरिटी विंडो में रख दिया।

तभी तो,
चाहनाएं मचल उठतीं
होंठ आभासी चुम्बन चुराते,
उंगलियाँ किसी स्मृति में
कमर पर फिसलतीं,
और आँखें,
छिपना चाहती थीं अपनी ही ख्वाहिशों से।

दिल कहता,
ये चाहत है…
ना छल, ना दोष।
बस एक अधूरी ज़रूरत,
किसी आम इंसान की।

मगर
दिमाग, संस्कारों से भरा
कह उठता,
इको करता हुआ,
गलत है न, थम जाओ!

पर
क्या करे वो?
दिल, प्रेम का सौदागर बन चुका था शायद।

और अंततः,
नज़रों ने कह ही दिया
प्रेम है… थोड़ा सा।
शायद अधूरा, शायद अस्वीकार्य,
पर हाँ,
सचमुच… प्रेम है

-मुकेश कुमार सिन्हा

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