पीले बादल से गोधूली
कोई भी बात नही भूली
घिर्री का चलना कलरव संग
चूड़ी का बजना खन खन खन
रधिया की बतियाँ सारी
बिछड़े सभी बारी बारी
प्यासे राही रुक जाते थे
चेन की बंशी बजाते थे
रहता था सदा जमघट
एकाकी है यह पनघट
घाट पूजतीं सगरी नारी
बिछड़े सभी बारी बारी।
मेरे चेहरे का नूर गया
हर लम्हा मुझसे दूर गया
वो गोरी की उन्मुक्त हँसी
मन मे अब भी महक बसी
वो पनघट वो पनिहारी
बिछड़े सभी बारी बारी।
तुम पढ़े लिखे मैं अनपढ़ ?
तुम आधुनिक मैं कमतर ?
तुमने मुझको बिसराया
मुझमे पिछड़ापन पाया
क्यों ले ली जान हमारी!
बिछड़े सभी बारी बारी।
-कीर्ति प्रदीप वर्मा
