पत्थरों के शहर में,
पत्थर ही बनकर रहना है।
दिल के इस दर्द को,
दिल के अन्दर रहना है।।
जिन्दगी की राह में,
काँटे है तो क्या हुआ।
चाह है मन्जिल की गर,
काँटो पे चलते रहना है।।
दोस्तों की दोस्ती पर,
जब भरोसा न रहा।
दुश्मनों के बीच में,
अब दोस्त बनकर रहना है।।
हमसफर मिल जाएंगे,
और सफर कट जाएगा।
हमसफर गर न मिलें,
तो तन्हा चलते रहना है।।
मौत के बाजार में,
क्यूँ जिन्दगी को ढूँढना।
मौत जब न आए तो,
मर मर के जीते रहना है।।
नफरत की दुनिया नमित,
है बेवफाओं से भरी।
इश्क के बाजार में,
बेवफा संग रहना है।।
-राकेश नमित
