एक गीत–

ठहरे-ठहरे जी ऊब रहा
मन कहता है कुछ और करूँ

पंछी बन नापूँ आसमान
सूरज की किरणों पर झूलूँ
हरियाला सावन ओढ़ हँसूं
रिमझिम स्वर में सब कुछ भूलूँ

तालों में खिलूँ कमल बन कर
कल-कल करती नदिया सा बहूँ

मन में संगीत उमड़ता है
पर चुप रहने की सजा मिली
कैसे बतलाऊँ दुनिया को
खिलना चाहे अधखिली कली

सुरभि लुटाने को आतुर
पारिजात फूलों सा झरूँ

तपती गर्मी में शीतल सी
मृदु सिहरन की अनुभूति बनूँ
साँझ विसर्जित दीपों सा
फूलों संग लहरों पर विहरूँ

थकी-थकी सी साँसों में
नव जीवन का उल्लास भरूँ

-डॉ मधु प्रधान
कानपुर

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