अपनी पुरानी किताबें और काग़ज समेट रहे थे ,
कि अचानक हाथ में आ गए उनके लिखे ख़त ।
जो रखे थे किसी बड़े -से लिफाफे में।
खोल कर एक-एक कर पढ़ना शुरू किया,
जो ले गए उन दिनों की यादों में।
ये ख़त तरीका था प्रेम दर्शाने का।
मन की बात बताने का।
जब न मोबाइल था ,
न चलन था प्रेम दिवस मनाने का।
शायराना अंदाज था उनका,
तभी तो ख़त मिलने पर लिखते-
“सेहरा में शबनम मिला”
शेर अर्ज़ करते
होने को अब भी होती है शाम ओ सहर,
पर कभी शाम, शाम हुआ करती थी और सहर ,सहर।
साथ में शिकायत भी रहती थी,
तुम्हारे ख़त किसी शासकीय पत्रों की तरह ज्यादा होते हैं।
मगर ये सब बातें फ़साना हो गयीं,
जो न लौट सके वो ज़माना हो गयीं।
आँसुओं ने सब धुंधला कर दिया था।
दो बूँदे गालों पर ठहर गयीं थीं,
जो शबनम की तरह लग रहीं थीं।
-डॉ अमृता शुक्ला
