“गौरैया की प्यास”
मई जून की तपती गर्मी
तालाब पोखर सूख गए
प्यास से बेहाल जीव जंतु पक्षी,
ढूंढे जल की अनमोल धार,
बस इतना कर दो मानव
एक सकोरे में पानी भर दो,
पी कर प्यास बुझ जायेगी,
दुआ मन से बरस जायेगी,
डाल डाल पात पात सूख के उदास है हमारा संसार,
तुम तो ए सी में बैठ गये
हम तड़पे बूंद बूंद को,
आह तडप धरा की देखो
स्वार्थ में जंगल काट डाले,
क्रंक्रीट के जंगल बना कर के,
माटी से दूर हुए,
आज हमारी प्रजाति
विलुप्ती की कगार पर है,
मिट गये अगर हम सब
तो जी तुम भी ना पाओगे।
-नमिता दुबे मिशा
