रविवारीय सुबह सूरज नहीं लाता, डोरबेल की कर्कश ध्वनि लेकर आती है। दूध वाला या हाउस हेल्प को टाला भी नहीं जा सकता। बेमन से ही सही, दरवाज़ा खोलना होता है। दूधवाला तो कुछ नहीं कहता लेकिन मैड जो अब मासी बन गई है, दो चार सुनाए बिना नहीं मानती। किचन में चाय बनाते हुए भी उसकी बड़बड़ाहट चलती रहती है।
बालकनी में बैठकर मोबाइल देखा तो फेसबुक ने बताया आज ऐरा का जन्मदिन है।
ऐरा बरुआ, प्राध्यापक फाइन आर्ट के नाम से नम्बर सेव है।
पूर्वोत्तर की सात बहनों, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा में असम से आई लड़की जिसकी आँखों और मुस्कान में वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता समाई लगती है।
मितभाषी परन्तु मिलनसार। विषय एक होने से हमारी बैठक व्यवस्था एक साथ थी। पुस्तकालय से लगे हॉल व दो कमरे फाइन आर्ट विभाग कहलाते थे। एक कमरा जो अपेक्षाकृत बड़ा था, वर्क रूम के साथ विभागीय स्टॉफ रूम था। एक तरफ़ जमे ईजल और दूसरी ओर हमारी मेज-कुर्सी। हवा में मिली रंगों व थिनर की खुशबू में एक और गंध शामिल हो गई थी जब से वो बैठने लगी थी साथ में।
बेला वीटा-स्कार्पियो नाम बताया था उसने अपने परफ्यूम का जिसकी सिट्रस-फ्लोरल महक ताजगी का अहसास कराती थी।
दो बार व्यस्त मिलने के बाद नम्बर लगा। खनकते रजत नूपुर सी आवाज़ में आये उसके अभिवादन के प्रत्युत्तर में उसे जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं तो आश्चर्य मिश्रित खुशी का पुट था उसके प्रश्न में, “आपको याद रहा मेरा जन्म दिन”।
ऐरा, सहकर्मी के साथ हम फेसबुक मित्र भी हैं। जुकरबर्ग नहीं भूलता खुशियों के दिन और पूरी तत्परता से दोस्तों को याद दिला देता है। उसने ही बताया कि आज आपका अवतरण दिवस है… मैंने सच बता दिया ।
ओह्ह! चलिए इसी बहाने आपकी शुभकामनाएँ मिलीं। वैसे घर से निकलने के बाद सिर्फ़ औपचारिकता या एक तारीख़ भर रह गया है जन्मदिन। वाट्स एप, मैसेंजर और फोन कॉल से शुभकामनाएँ मिल जाती हैं, बस ऐसे ही आकर, गुजर जाता है जन्मदिन।
वैसे तो कॉलेज में सभी का जन्मदिन मनाया जाता है लेकिन आज रविवार है। ऐसा करते हैं हम मनाते हैं। बताईये कहाँ केक काटेंगी आप? चलते हैं आपकी पसंदीदा जगह ।
हँसी थी वो। पार्टी आप दे रहे हैं तो जगह भी आप ही डिसाइड कीजिये। वैसे अगर मेरी मानें तो आप घर आ जाईये। आपको असम का प्रसिद्ध खार, आलू पिटिका और पीठा खिलाऊँगी।
आईडिया तो जबरदस्त है लेकिन ये डिशेज हैं तो शाकाहारी? मैं नॉन-वेज नहीं खाता।
आप निश्चिंत रहिए। खार, असम का एक अनूठा व्यंजन है जो कच्चे पपीते, दाल और सब्जियों को केले के पेड़ की छाल से बनी राख के साथ मिलाकर बनाया जाता है।
आलू पिटिका, उबले आलू, कच्ची प्याज, हरी मिर्च और सरसों के तेल से बनता है और पीठा तो चावल के आटे से बना मीठा स्नैक है।
डरिये मत, आपका धर्म भ्रष्ट नहीं करूँगी…
मैड को लंच न बनाने का कहकर तैयारी की ऐरा के घर जाने की। रास्ते में रजनीगंधा का गुलदस्ता, उसका प्रिय परफ्यूम और कैक लेकर जब उसके घर पहुँचा वो रसोई में अपनी कुक के साथ आज की पार्टी की तैयारियों में व्यस्त थी।
मुझे बिठाकर और बस दस मिनट में आने का कहकर वो फिर से किचन में लौट गई। मैं उसकी सुरुचिपूर्ण सजावट और व्यवस्थित बैठक का मुआयना करने लगा।
शेल्फ में सलीके से सजी किताबें, कुछ वास्तु और फेंगशुई से सम्बन्धित सामग्री के साथ जिस बात ने ध्यान आकर्षित किया वो एक पोर्ट्रेट था। यक़ीनन बेहद खूबसूरत मगर उसका शीर्षक “ओ रंगरेज़” चौंका रहा था ।
मेरे चेहरे पर बिखरे असमंजस को पढ़ लिया था ऐरा ने। पता नहीं चला वो कब आ गई थी किचन से।
“इतने ध्यान से क्या देख रहे हैं, मुझे ही रंगों में उकेरा था किसी ने।”
वही देख रहा हूँ । रंगरेज़ तो कपड़ों को रंगता है… कैनवास पर कूची कैसे चला दी रंगरेज़ ने?
मंदिर में बजती घंटी की मधुरता थी उसकी हँसी में। खुद को संयत कर बोली, कलात्मक संदर्भ में कपड़ों को रंगने वाला कारीगर ही है रंगरेज़।
अगर सूफ़ी या आध्यात्मिक संदर्भ में देखा जाए तो रंगरेज़ा वो मुर्शिद या गुरु होता है जो ईश्वर के प्रेम में आस्था के रंगों से मन को रंग देता है।
भर दिए थे किसी ने चाहत के रंग मन में और रंगरेज़ का स्वरूप बदल गया। कलाकार न रहकर वो मुर्शिद बन गया… लेकिन यह कल की बात है जो बीत गया। अब तो,
रंग, खुशबू और मौसम का बहाना हो गया
अपनी ही तस्वीर में चेहरा पुराना हो गया
अरे वाह । आप तो चित्रकारी के साथ शाइरी भी करती हैं।
नहीं… नहीं। यह मेरा नहीं खालिद गनी की ग़ज़ल का शेर है। कहीं पढ़ा और याद रह गया क्योंकि यह बीते वक़्त, तन्हाई और यादों के उम्रदराज़ होने के अहसास को बखूबी बयान करता है ।
लेकिन यादें उम्रदराज़ हुई क्यों और कौन है वो रंगरेज़?
पोर्ट्रेट पर बिखरे रंगों से कहीं ज्यादा रंग ऐरा की आँखों में आते जाते रहे। उसकी नज़र सामने वाली दीवार को भेदकर उस तरफ़ कुछ देख रही थी। वो शायद अपने-आप से बात कर रही थी, कायन नाम था… उसी रंगरेज़ का जिसने मेरे मन की दीवारों पर अपनी चाहत के रंगों से अनगिनत तस्वीरें बना दी थीं…
कायन!… कहाँ है अब?
पता नहीं। तेजपुर के दर्रांग कॉलेज में हम साथ पढ़ते थे। पोस्टग्रेजुएशन के बाद वो कहाँ गया, नहीं मालूम।
अजीब बात है, तुम लोग प्यार करते थे एक-दूसरे से और कह रही हो उसके बारे में कुछ नहीं पता। कैसे हुआ यह?
आपको शायद अंदाजा नहीं है। असम में दो गुटों की दुश्मनी कोई नई बात नहीं है। मैं जिस परिवार से हूँ वो जनजातीय सुरक्षा मंच (स्वदेशी जनजातीय समुदाय का प्रतिनिधि) से जुड़ा हुआ है और धर्मांतरित आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाने की मांग कर रहा है। इनका तर्क है कि जो आदिवासी धर्म बदलकर ईसाई या अन्य धर्म अपना चुके हैं, वे अब जनजातीय संस्कृति और रीति-रिवाजों का पालन नहीं करते, इसलिए उन्हें आदिवासियों का आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
धर्मांतरित आदिवासी या जिसे विपक्षी गुट भी कहा जाता है, यह समूह इन मांगों का विरोध करता है और इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर हमला मानता है।
कायन धर्मांतरित संप्रदाय से होने की वजह से मेरे समाज के लिए अस्वीकार्य था। हमारा एक गलत कदम दोनों समुदायों के खून का प्यासा हो जाता। पता नहीं कहाँ तक फैलती नफरत की आग और हिंसा ना जाने कितनी जानें लेती। बस हम दोनों ने दो संप्रदाय की नफरत और सियासत को ध्यान में रखते हुए अलग होना सही समझा और हमेशा के लिए अलग हो गए।
मैं यहाँ आ गई और कायन देश छोड़ कर चला गया।
ऐरा के आँसू शायद दो धुर विरोधी समुदायों की सोच में भड़की आग पर बरस कर उसे बुझाने की कोशिश कर रहे थे।
असली रंगरेज़ अब सियासतदान हैं। अपने वोट और सत्ता के लिए आपसी फूट को हवा देकर आग भड़का रहे हैं। यही मणीपुर में हो रहा है। सुलग रहा है वर्षों से।
ऐरा की कुक ने खाना लगाने का पूछा।
मैंने साथ लाए सामान को सेंटर टेबल पर लगाया।
ऐरा ने केक काटा। मैंने उपहार के साथ अपनी शुभकामनाएँ देते हुए उसके रंगरेज़ा की सलामती और फिर मिलने की दुआ दी।
ऐरा की निगाह उसी पोर्ट्रेट पर ठहरी थी। शायद पुकार रही थी वो अपने रंगरेज़ा को…
-मुकेश दुबे
