“सोना – कनक – स्वर्ण”
संसार जिसे कहता कनक है,
वह तो केवल माया है,
सच्चा स्वर्ण वही है जिसने,
अंतर-दीप जलाया है।
जैसे अग्नि में तपकर सोना
कुंदन रूप में ढलता है,
वैसे ही दुख की भट्ठी में
मानव-मन भी निखरता है।
बाह्य चमक को त्याग जिसने
अंतर-स्वर्ण पहचान लिया,
मोह-निशा के गहरे तम से
उसने खुद को जान लिया।
यह काया भी स्वर्ण-कलश है,
जिसमें प्रभु का वास है,
मिट्टी का यह तन मिट जाएगा,
शाश्वत आत्म-प्रकाश है।
-डॉ. संगीता बिंदल
