कहानी

“चाय बना रही हूं, पीकर ऑफिस चले जाना” माही के इतना कहते ही मैंने उसे घूरकर देखा…
“आज 12 मई है… भूल गई क्या… जल्दी निकलना है” मैंने तौलिया बाथरूम में रखते हुए कहा..
“ओहो… हां भूल गई थी… चलो कोई ना.. फिर खाना भी कुछ बाहर ही खा लेना… टिफिन में थोड़ा टाइम लगेगा… और अब तो ये 12 मई का ये चक्कर छोड़ दो…पता नहीं कब…” माही उसके बाद भी बड़बड़ाती रही लेकिन मेरा ध्यान 12 मई पर फिर से आ गया था…

2008 की बात है… कॉलेज के बाहर नुक्कड़ पर एक नमकीन कचोरी की दुकान पर खड़ा था… सामने मेरा स्कूटर जो किसी महाराजा के जमाने का था, जिंदगी के अंतिम क्षणों में भी बराबर भाग रहा था… तभी ऑटो से एक लड़की को उतरते हुए देखा… सफेद सलवार कमीज और ऊपर से लाल दुपट्टा… खुले बाल, कंधे पर लटकाया एक छोटा सा ब्राउन बैग… और राजस्थानी जूती… छोटी से बिंदी और होंठों पर हल्की लाल लिपस्टिक… उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे तपती धूप में बादल का छांव आ गया हो… हम बॉयज कॉलेज (आर्ट्स विंग ओनली बॉयज़) में पढ़ने वाले लड़कों के लिए तो ये बरसात की फुहार की तरह थी…

“भैया एक कचोरी देना…” उसने पैसे मेरी तरफ बढ़ा दिए…
“ओए लाल, एक कचोरी देना इनको” मैंने चिल्लाकर कहा और दुकान से बाहर आ गया… दुकान पर अक्सर जाते रहने के कारण कई बार दुकान के अंदर बैठ जाता था मैं… और उसने मुझे नमकीन वाला समझ लिया था…

“ओह सॉरी… मुझे लगा आपकी दुकान है” लड़की ने मुस्कुराकर कहा…
सच बताऊं अगर उस वक्त पैसे होते तो वो दुकान उसी दिन मेरी होती…
“कोई बात नहीं… अपनी ही समझ लो आप तो… बस इसी दुकान में पड़े रहते है… कुछ दिन में तो मैं खुद अच्छी कचोरी बनाना सीख जाऊंगा…” कहकर मैं हंसने लगा… उसकी तरफ देखा तो वो हल्की सी मुस्कान देकर कचोरी खाने में व्यस्त हो गई… शायद उसको मेरी बातों में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं था… मैने अपनी स्कूटर की तरफ देखा… मानों वो भी मुझ पर हंस रहा था… मैं जेब से चाभी निकाली और स्कूटर की तरफ निकल पड़ा…
“अच्छा सुनो… एक बात बताना, ये कॉमर्स विंग कहा पड़ता है? उस लड़की ने फिर से मेरी तरफ आवाज लगाकर कहा…
“ओह आप कॉलेज में नए हो क्या… कॉमर्स विंग के लिए आपको यहां से कोई ऑटो या बस तो नहीं… अच्छा रहने दो.. मैं आर्ट्स का स्टूडेंट हूं… ये मेरा आई डी कार्ड… आप चलो मैं आपको कॉमर्स विंग छोड़ दूंगा…” मैंने अपनी बात कहकर उसके जवाब का इंतजार करने लगा… पता था मना ही करेगी लेकिन चांस लेने में कोई दिक्कत नहीं था…
“ओके.. चलो चलते है…” उसने झट से हां कह दिया… कभी कभी जिंदगी कितनी आसान होती है… एक सिंपल सी हां और कोई कॉम्प्लेक्सिटी ही नहीं… लेकिन बिना कॉम्प्लेक्सिटी के जिंदगी कब रही है…
“आज ही कुछ प्रॉब्लम हुई है वरना तो एक किक में स्टार्ट हो जाती है…” मैंने हांफते हुए अपनी स्कूटर को देखते हुए कहा… वो अभी भी मुस्कुरा रही थी… स्कूटर के स्टार्ट होते ही वो पीछे बैठी और मैंने उसे कॉमर्स विंग के अन्दर छोड़ दिया…

“अरे ये तो यही है… इतना पास” उसने स्कूटर से उतरते हुए कहा…
“हां बिल्कुल सही कहा… यही कॉमर्स विंग है… हमारा आर्ट्स विंग दूर पड़ता है इसीलिए स्कूटर लेकर ही कचोरी खाने बाहर आते है…” मैं अपनी स्मार्टनेस छुपाने के लिए थोड़ा सीरियस होकर बोला… वो मुस्कुराने लगी और गेट से अंदर चली गई…

मैंने भी स्कूटर स्टार्ट किया और निकल पड़ा… “ना नाम, ना नंबर… अरे शिशिर… अगली बार मिलेगा कैसे…” मैंने तुरंत मन ही मन सोचा… पीछे मुड़कर देखा तो वो भीड़ में ओझल हो गई थी… “कोई ना… किस्मत में होगा तो फिर से मिल जाएगी…” अपनी गलती को दबाते हुए मैं मुस्कुराने लगा.. कभी कभी क्षणिक खुशी भी जिंदगी के अनमोल खुशी दे देती है…

12 मई 2009… जोधपुर का स्थापना दिवस… हर स्थापना दिवस पर अपने कॉलेज से रैली निकलती थी… हाथ में डंडा और तख्ती लिए पूरी कॉलेज के लोग गाड़ियों से जोधपुर के चक्कर लगाते थे… मुझे इन रैलियों में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं था… उसी कचोरी की दुकान पर खड़ा रैली के लोगों को देखकर इनके भविष्य का अनुमान लगा रहा था…
“दुकान खरीद ली या अब भी ऐसे ही खड़े हो… 20 कचोरी पैक करवा देना” फिर से वही आवाज और फिर से पैसे मेरी तरफ… “मुझे पता है दुकान तुम्हारी नहीं है लेकिन पैक तो करवा ही सकते हो…”
कसम से कह रहा हूं… अगर उस दिन फिर से पैसे होते तो उस दिन फिर से दुकान मेरी… खैर…

“हां – हां… बिल्कुल… दुकान तो लगभग मेरी ही है… लेकिन अभी रैली के लिए कचोरी का ऑर्डर लगा हुआ है… थोड़ा टाइम लगेगा… वैसे तुम्हारे लिए 1 पीस निकलवा सकता हूं…”
“एक नहीं 20 चाहिए… वो क्या है आज मेरा बर्थडे है… तो सभी दोस्तों को कचोरी खिलानी है…”
मैं मुस्कुराने लग गया… “अरे वाह… तुम्हारा बर्थडे आज है… क्या बात है… चलो मैं तुम्हे शाम में एक अच्छा सा बर्थडे शायरी भेजता हूं…”
“अच्छा शाम में भेजोगे.. फिर तो तुम्हे मेरा नंबर भी चाहिए होगा… और बिना मेरे नाम के तुम नंबर सेव भी नहीं कर पाओगे” वो खिलखिला कर हंस पड़ी…
मैं झेंप गया… हमने नंबर एक्सचेंज कर लिया…
“हिमानी माथुर” और मैं “शिशिर सक्सेना” मतलब उम्मीद तो कर सकता हूं…
अगले 3 साल तक हमारी कई मुलाकातें जोधपुर के कई कैफेस और गार्डन में होती रही… सिंपल लेकिन काफी सुलझी लड़की थी हिमानी… चाहे हम पूरे साल कहीं भी घूमे लेकिन 12 मई की सुबह हम कचोरी खाने उसी दुकान पर जाते…

कॉलेज के बाद हिमानी आगे की पढ़ाई के लिए जोधपुर से बाहर चली गई और मैं जॉब करने दिल्ली… हम लगातार टच में रहने का प्रयास करते थे… लेकिन लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप ज्यादा काम नहीं करती… जॉब के बाद बिजनेस करने फिर से जोधपुर आ गया… हिमानी से अब बस सिर्फ हाय – हेलो रह गया था… चीज़ें बदल गई थी… समय बदल गया था… लेकिन नहीं बदला तो वो 12 मई को कचोरी खाने जाने की आदत… जब जब जोधपुर रहता और 12 मई आती… कचोरी खाने पहुंच कॉलेज पहुंच जाता…

घरवालों की इच्छा से मेरी शादी हो गई… आज शादी के 13 साल हो गए… शादी के तुरंत बाद ही माही को ये हर साल 12 मई को कॉलेज जाने वाली बात बता दी थी… पहले तो वो थोड़ा गुस्सा करी फिर मुस्कुराने लगी… “ठीक है… मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है… लेकिन इससे ज्यादा मुझसे कुछ उम्मीद मत रखना” मैं समझ गया था… और मन को भी समझा लिया…

“लाल… 2 कचोरी और 1 चाय देना…”
“अरे भैया जी आप… अभी देता हूं…”
कचोरी खाते खाते कितनी ही पुरानी यादें ताजा हो रही थी… वही कॉलेज का नुक्कड़… वही रैली की तैयारी… वही कचोरी की दुकान… बस “लाल” बड़ा हो गया था और स्कूटर बदल गया था…

“दुकान खरीद ली या आज भी वैसे ही खड़े हो… एक कचोरी तो खिला दो… और साथ में चाय भी… घर पर तो पीने नहीं दी…” मैंने मुड़कर देखा तो वही सफेद सलवार सूट, लाल दुपट्टा… खुले बाल… बस मांग में सिंदूर था इस बार…
“लाल, आज तो तू दुकान की रेट बोल… खरीद ही लेता हूं…” कहकर मैं हंसने लगा…
“क्यों मिसेज हिमानी शिशिर सक्सेना जी…” मैंने माही की तरफ देख कर कहा… वो हंसने लग गई…

-अनिकेत गुप्त

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