कितनीं फरमाईशे
कितनी आजमाईशे
इक स्त्री के कितनें रूप
कितनें चेहरे
इक भावहीन मन कितनीं भाषायें सिखता
कितने अर्थ समझता
कितनीं आकांक्षाये पूर्ण करता
कितना अधूरा रहता
मन की तार्किक कसौटी पर हर तथ्य असफल होता
तुम्हारा चेहरा भी आईने में
इक नयी पहचान ढ़ूँढ़ता
मन की यह सिफ्त रही
वह सुनता नहीं
गुननें की उसकी फितरत है
तुम उगँलियो पर दिन गिनना
हर गुजरी बातों का इक मौसम होता है
और
हर आगत की इक आहट होती है
कहीं वह दस्तक दे और
तुम सुन नहीं पाओ
समझ नही पाओ !
-नीना सिन्हा
