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किसी के दिल में, हलचल करना पड़ता है।
या फिर नयनों से, घायल करना पड़ता है।
मुहब्बत यूं नहीं मिलती किसी को भी,
दिवाने दिल को, पागल करना पड़ता है।
अगर है धूप से परहेज़ तो गेसूं,
उठाकर फिर से, बादल करना पड़ता है।
निगाहों को निगाहों से मिलाकर ही,
हमें आंखों में, काजल करना पड़ता है।
मुहब्बत हो अगर रूठी तो धीरे से,
मनाकर दिल को, कोमल करना पड़ता है।
लगे गर्मी कभी उसको उठाकर फिर,
हथेली को ही, पीपल करना पड़ता है।
रखेगी बात वो ऊपर सदा अपनी,
समझकर मन को, सीतल करना पड़ता है।
यही है प्रेम की खूबी अगर मानो,
बिना शर्तों के, निश्छल करना पड़ता है।
छुपाकर दर्द तुम जीते ‘अकेला’ क्यों,
यहां तो खुद को, चंचल करना पड़ता है।
-संतोष सिंह ‘अकेला’
