ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी;
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी, कुछ ख़्वाहिश है मेरी..
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी,
कुछ ख़्वाहिश है मेरी….
एक दिन तो तू भी ना रहेगी; एक दिन मैं ना रहूँगा…
तुम मेरी हो…मैं हूँ तेरा..फिर मैं किस से कहूँगा..
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी, कुछ ख़्वाहिश है मेरी..
एक ही तो था, प्यार या नफ़रत…पास मेरे तुम ही तो थी..
क्यों था ख़ुश और क्यों रोया मैं..तुम क्यों इतनी गुमसुम थी…
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी, कुछ ख़्वाहिश है मेरी..
क्या ख़ुद को मैं, माफ़ करूँगा? क्या तुम माफ़ करोगी..
मेरे प्यार का अपने दिल से, तुम इंसाफ़ करोगी…
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी, कुछ ख़्वाहिश है मेरी..
एक दिन तो, दिल भी ना रहेगी…धड़कन भी ना रहेगा…
बंद रहेंगी आँखे…फिर क्या ? पलकों में सपना सज़ेगा.?
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी, कुछ ख़्वाहिश है मेरी..
माफ़ मुझे तुम कर देना..
माफ़ मुझे तुम कर देना, हो जैसे भी अपने मन से….
अपनी आँखों से बरसाना….
अपनी आँखों से बरसाना…,निर्मल जल मेरे तन पे…
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी, ये ख़्वाहिश है मेरी..
ज़िंदगी, ज़िंदगी, ज़िंदगी, ये ख़्वाहिश है मेरी..…।
-चन्दन झा
