पति के इंतकाल के बाद बिमला अपने एक मात्र पुत्र सौरभ को सरकारी नौकरी पाने की तैयारी हेतु शहर भेज दिया।
अपने मामा विनय की सलाह और आशीर्वाद सौरभ के साथ था।
धनाढ्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली विमला देवी को सिर्फ एक ही पुत्र सौरभ, पढ़ने में अव्वल दर्जे का तेज तर्रार लड़का था।
विमला देवी को भरोसा था कि उसका बेटा कोई बड़ी सरकारी नौकरी पा लेगा।
सौरभ भी अपनी माँ की इच्छा पूर्ति हेतु संकल्प कर घर से निकल शहर में रह तैयारी करने लगा।
इधर गाँव में विमला के पाटीदार लोग विमला को परेशान करने लगे थे।
पाटीदार चाहते थे कि विमला के हिस्से जो जमीनें हैं उसे कब्जा कर लें।
कई तरह के आरोप प्रत्यारोप बीच विमला मौन धारण कर पाटीदारों की व्यंग्यात्मक वाणियों को सुनती रहती थी।
पाटीदारों को पता नहीं चल पा रहा था कि इतनी छिट्टा कस्सी के बाद भी विमला कोई जवाब न देकर मौन कैसे रह लेती है।
आखिर विमला की खामोशी के उस पार क्या है?
पाटीदारों की बेचैनियाँ बढ़ जाती रही।
किसी तरह दो साल और गुजरा होगा कि एक दिन अखबार में राज्य प्रशासनिक सेवा आयोग की परीक्षा का परीक्षा परिणाम घोषित हुआ।
घोषित परिणाम में सबसे उपर नाम सौरभ का था।
सौरभ ने राज्य प्रशासनिक परीक्षा पास कर लिया और उसका चयन पुलिस विभाग में डी.एस.पी.पद के लिए हुआ था।
विमला की तो खुशी का ठिकाना नहीं पर पाटीदारों के चेहरे में उदासी छा गई।
अब पाटीदारों को समझ में आया कि विमला की खामोशी के उस पार क्या था।
-अजय पाण्डेय बेबस
