मालाड स्टेशन के बाहर एक अजीब एटीएम लगा था। न बैंक का नाम, न गार्ड। बस ऊपर लिखा था — “खुशियों का एटीएम — 24×7”
लोग हँसते, सेल्फी लेते, आगे बढ़ जाते।
रमेश, BCom सेकंड ईयर का लड़का, रोज़ ट्यूशन पढ़ाने उसी रास्ते से जाता। जेब में बस ₹20 और दिमाग में कल की फीस की टेंशन। एक दिन हिम्मत करके उसने मशीन के बटन दबाए। स्क्रीन पर लिखा आया।
“अपना PIN डालें: कोई एक दुख जो आप जमा करना चाहते हैं”
रमेश ने टाइप किया “पापा की नौकरी चली गई”
मशीन से खटर-पटर की आवाज़ आई और नीचे से एक पर्ची निकली। पर्ची पर लिखा था:
“निकासी सफल: 1 कप चाय,10 मिनट का सुकून”
और सच में, बगल की टपरी वाले काका मुस्कुराकर बोले “बैठ बेटा, आज चाय मेरी तरफ से। थका लगता है।”
अगले दिन रमेश फिर गया। PIN माँगा “माँ बीमार है”
पर्ची निकली: निकासी सफल: पड़ोस की आंटी का बना हलवा हौसला”
घर पहुँचा तो देखा पड़ोस वाली सुधा आंटी माँ के लिए हलवा ले आई थीं।
धीरे-धीरे पूरी मालाड ईस्ट को पता चल गया। लोग अपना दुख डालते “नौकरी नहीं मिली”, “बेटा बात नहीं करता”, “अकेलापन”।
बदले में किसी को बच्चे की किलकारी सुनने को मिलती, किसी को पुराने दोस्त का फोन, किसी को बस एक लंबी नींद।
एक दिन नगर निगम वाले मशीन उखाड़ने आए। बोले “बिना परमिशन का एटीएम है।”
भीड़ जमा हो गई। एक बूढ़े दादाजी बोले “साहब, ये मशीन नहीं, हम सब हैं। जब रमेश ने अपना दुख डाला, तो काका ने चाय पिलाई। जब काका ने थकान डाली, तो मैंने उन्हें दवा दी। ये एटीएम हम सबके दिलों में लगा है। असली PIN है,बाँटना’।
अफसर सिर झुकाकर चला गया। मशीन आज भी वहीं है।
रमेश अब भी ट्यूशन पढ़ाता है। पर अब उसकी जेब में ₹20 हों या न हों, आँखों में खुशियों का बैलेंस हमेशा फुल रहता है।
क्योंकि उसने सीख लिया था ।खुशियों का एटीएम कार्ड से नहीं, कर्म से चलता है। और उसका नेटवर्क पूरे हिंदुस्तान में है।
-आनंद पाण्डेय “केवल”
