माँ पापा के साए में..
वो बचपन ही था|
जब हर छोटी सी बात पर..
मन उल्लास से भर जाता था|
चाहे नए कपड़ों का आना हो..
या अचानक से स्कूल की छुट्टी मिल जाना हो|
कभी दोस्तों के साथ पिकनिक जाने की उमंग..
और कभी जन्मदिन पर मलाई केक बन जाने की खुशी..
वो छोटे-छोटे तोहफे मिल जाने से चेहरे की चमक दुगनी हो जाना |
और हाँ गर्मी की छुट्टियाँ|
वो कॉमिक्स पढ़ने का चाव|
बर्फ के गोले , इमली के चटकारे..
शाम ढलते ही हुड़दंग खेल ढेर सारे..
वो बेफिक्री, मासूमियत बेख़ौफ़..
दुनियादारी से परे बचपन..
जैसे कही खो गया|
हाँ वही सच्ची खुशियाँ थी|
जो आज भी हमारे वक़्त की गुल्लक में महफूज है|
इस बदलते दौर में
अब तो बहाने तलाशते लगते है हम|
खुश होने के..
जीवन में उल्लास भरने के लिए|
हर्ष के लिए|
-नवनीता कटकवार शुक्ला
बालाघाट (म.प्र.)
