गले मिलने की रवायत

​गले मिलने की रवायत खो गई हुक्काम में,
घुल गया है ज़हर कैसा आज इस आवाम में।

​दुश्मनी इस मोड़ पर आ जाएगी सोचा न था,
लोग इज़्ज़त बेचते हैं आज सस्ते दाम में।

​बात केवल सोच की या सिर्फ़ मत की अब नहीं,
गालियाँ शामिल हुई हैं अब सुबह और शाम में।

​इन सियासत सिरफिरों ने लाज अब तो छोड़ दी,
ढूँढ़ते हैं ऐब वो हर एक अच्छे काम में।

​तीर नफ़रत के चलाए जा रहे हैं इस तरह,
कट रही है हर ज़बाँ अब बहर-ए-इल्ज़ाम में।

-सुशील शर्मा

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