गीत ग़ज़ल का शौक पुराना छोड़ दिया
टूटे दिल ने साज़ बजाना छोड़ दिया
यार पतंगे फटी पड़ी है चाहत की
हमने दिल के पेंच लड़ाना छोड़ दिया
अब चाहत सीधे बिस्तर तक जाती है
प्यार व्यार का बोझ उठाना छोड़ दिया
आज वक़्त ने तबियत से बदली करवट
सर्द बदन से भाँप उड़ाना छोड़ दिया
आज हवस की दिल पे ठेकेदारी है
इज्ज़त को भगवान बनाना छोड़ दिया
लगती है जो खाली पापी पेटों में
हमने ऐसी आग बुझाना छोड़ दिया
पीते हैं बेखौफ़ बदन की मदिरा को
अब लोहे के चने चबाना छोड़ दिया
-दिनकर राव दिनकर
