दिग्भ्रमित जिसे चांदनी रात जिसे समझा था।
अमावस से गहरी काली यामिनी निकले॥
अधरों पर थे वो मधुमास की मुस्कान लिए,,
इंसानी चेहरे के पीछे राक्षस प्राणी निकले॥
मतिभरम की मृग मरीचिका सा बीता जीवन।
सुनहरे सपनों की इक अधूरी कहानी निकले॥
प्रेम की परिभाषा धूमिल हुई इस कलयुग में।
शराफ़त के लिबास में शैतानों की नानी निकले॥
सच आया जब सामने, सारे बंधनों को तोड़ताड़ के।
मक्कारियों छिपाने के सारे जतन बेमानी निकले॥
-सुमन सुहाग
