गौरैया की प्यास
पाषाण पात्र में धरा गगन का टुकड़ा नीला,
चोंच डुबोकर पीती गौरैया, मन कितना भोला।
एक बूँद टपकी जल से, उठीं लहरें गोल-गोल,
मानो प्रकृति ने खुद रच दिया कोई मधुरम बोल।
भूले शहर के शोर में, आँगन की चहचहाहट,
छत-मुंडेर सूनी हुई, रूठी गौरैया की आहट।
तिनके से घर बुनने वाली,आज जल को तरसी,
क्या हमने ही छीनी उससे, उसकी हरियाली सरसी?
हे मानव,तू थोड़ा रुक जा,भर दे इक पात्र जल,
तेरे इस छोटे से कर्म से,खिलेगा किसी का कल।
यह नन्ही चिड़िया नहीं, संदेश है जीवन का,
जल है तो कल है, बस यही सार है जग का।
आओ लौटा दें फिर से, वो बचपन वाली भोर,
जब गौरैया संग जगते थे, सुनकर मीठा शोर।
बस एक सकोरा रख दो,छत की मुंडेर पर,
पुण्य मिलेगा तुमको,इसके चोंच भर जल पर।
मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
