मैं सुहागन चांदनी हूँ जलाशय की
तुम पूर्णिमा के चंद्र का प्रतिबिंब हो,
मैं बस तुम्हारे प्रेम का अनुबंध हूँ
तुम पुरुष हो; तुम सर्वथा निर्बंध हो।
मात्र कंकड़ से समूची कांप जाती
भावना जगती; मगर मैं ढाँप जाती,
कोष मेरे हृदय के भी लाल ही हैं
पर मैं यहाँ के नियम सारे भांप जाती।
चाह कर भी नज़र मेरी उठ सके ना
पलक से जो बंध बांधा; खुल सके ना,
अर्धांगिनी बन कर किसीकी रह गयी हूँ
पूर्णत्व को मैं ख़ुद अधूरा कर गयी हूँ।
नारी का भले हो तुम मुझे सम्मान देते,
मैं तो तुम्हारी मात्र छाया बन गयी हूँ।
-विवेक कवीश्वर
