जख़्म ग़म ज़िन्दगी में भारी है
दर्द का सिलसिला भी जारी है
लड़खड़ाने लगी है ये दुनिया
वक़्त की चोट भी करारी है
क्या बताएँ कि पेट भरने को
सर पे कितनी चढ़ी उधारी है
चार खंबों पे घास की छप्पर
कल हमारी थी अब तुम्हारी है
दाल रोटी को तरसता इंसा
ज़िन्दगी अब नमक से खारी है।
-दिनकर राव दिनकर
