जात पात के नाम किसी को बाटो मत
धरम कर्म के नाम किसी को काटो मत
हिंदुस्तानी जितने भी है सब तो भाई हैं
मजहब के तुम नाम किसी को छाटों मत
डर लगता है ख़ून की अब तो होली से
डर लगता है कटु कटु सी बोली से
हिंसा की राहों पर तुम क्यूँ चलते हो
डर लगता है बारूद मुझको गोली से
भूल गए क्या जो बुद्ध ने सिखलाया है
सत्य राह ही जिसने हमें दिखलाया है
बाईबिल गीता कुरान एक सबका सार हुआ
करो जरा सम्मान यही तो बतालाया है
-किशोर छिपेश्वर “सागर “
बालाघाट
