जीवन का सत्व रूप है तू , तुझसा कोई समर्थ नही ,
खुद को ना पहचाना तो , जीवन का कोई अर्थ नही !
जीवन का सत्व रूप है तू , तुझसा कोई समर्थ नहीं !
चेतना केन्द्र की मैं दृष्टि , आन्तरिक बोध से परिपूर्ण ,
प्राकृत दृष्टि गुण दृष्टा का , अनुभुति में प्रखर निपुण !
दृश्य देखने वाला, ना जड़ , ना देह इन्द्रियां और मन ,
विविध उपकरणों से लेता , नवीन अनुभूतियां विभिन्न !!
जीवन का सत्व रूप है तू , तुझसा कोई समर्थ नहीं !
एक ही चेतना विद्युत ब्रह्म में , ना दूजा इसके समान ,
असल विश्व भूतादि को , करता सकल यह ऊर्जावान !
विद्युत के प्रकाश में दिखता , वस्तु उजास अंधेर स्थान ,
प्रकाशक के मिट जाने पर भी ,विधुत रहती विद्यमान !!
जीवन का सत्व रूप है तू , तुझसा कोई समर्थ नहीं !
सब कुछ बोध करने वाला , चित, रखता स्व संज्ञान ,
शाश्वत, त्रिकाल में, ना मिटता , वो सत तत्व महान !
घड़े हेतु मिट्टी, उपादान तो , भौतिकी उसका कारण ,
बहुल घटकों में दिखना , उस एकल का ही विस्तारण !!
जीवन का सत्व रूप है तू , तुझसा कोई समर्थ नही !
मैं सोते में देखु सपना , तम, खालीपन महसूस करूं ,
दिखता उसको जानूं , जो ना दिखता अहसास करूं !
आंख कान इंद्रियां हट जाये , फिर भी मैं रहने वाला ,
क्षेत्र यंत्र भले मिट जाये , क्षेत्रज्ञ नही मिटने वाला !!
जीवन का सत्व रूप है तू , तुझसा कोई समर्थ नहीं !
खुद को ना पहचाना तो , जीवन का कोई अर्थ नही !!
जीवन का सत्व रूप है तू , तुझसा कोई समर्थ नहीं !
-एल. पी. शर्मा “लक्ष्य“
जयपुर (राज)
