जब एक लड़की
अपना आँगन, अपना बचपन,
माँ की ममता और पिता का साया छोड़कर
किसी अनजान घर की दहलीज़ पर कदम रखती है,
तब उसे केवल एक रिश्ता नहीं,
एक सच्चे जीवन साथी की जरूरत होती है।
ऐसा साथी
जो उसके मौन को भी पढ़ सके,
जिसकी आँखों में अपनापन हो
और शब्दों में भरोसे की गर्माहट।
वह चाहती है कोई ऐसा हाथ
जो मुश्किल घड़ी में थाम ले उसे,
जो उसके आँसुओं को समझे
और उसकी मुस्कुराहट की वजह बने।
वह कोई राजा नहीं माँगती,
न ही सोने-चाँदी के महल,
बस उसका दिल चाहता है
उसका सम्मान सुरक्षित रहे।
एक साथी
जो उसे बदले नहीं, समझे,
जो उसके सपनों को भी
अपनी उड़ान का हिस्सा बना ले।
जब दुनिया की भीड़ में
वह खुद को अकेला पाए,
तब वही जीवन साथी
उसके लिए पूरा संसार बन जाए।
जो उससे कहे
“तुम आई हो तो घर- घर लगता है,
तुम्हारी हँसी से ही
मेरे जीवन का हर दिन सजता है।”
क्योंकि एक लड़की
घर छोड़कर केवल पत्नी नहीं बनती,
वह विश्वास बनकर आती है —
और उसे चाहिए
एक ऐसा जीवन साथी
“ऐ दविंदर”
जो उस विश्वास को
सारी उम्र संभाल सक।
-डॉ. दविंदर कौर होरा
इंदौर म.प्र
