आज का दिन मेरे जीवन में बहुत ही खास और महत्वपूर्ण है। अपनी साहित्यिक उपलब्धियों में एक और वरदान जुड़ा — मां सरस्वती की कृपा के रूप में। आज मुझे साहित्यिक संघ, वाराणसी के द्वारा “सेवक साहित्य श्री सम्मान” से सम्मानित किया जाएगा। यह मां भारती के चरणों में अपने सृजन का दाय देकर प्राप्त एक गौरव और सम्मान है।
मुख्य समारोह ईश्वरगंगी, वाराणसी में था। उस क्षेत्र में मेरा बचपन बीता था। किशोरावस्था के बढ़ते कदमों ने पहली बार वहीं अपने सपनों में रंग भरा था, जहां पहली बार हाथों में कलम थामी थी। आज उसी धरती पर, अपनों के बीच, अपनों के द्वारा सम्मानित हो रही थी — बनारस की बेटी।
शादी की गहमागहमी के बीच इस सम्मान समारोह में शामिल हो पाना कठिन लग रहा था, क्योंकि शाम को अनेक वैवाहिक रीति-रिवाज होने थे, जिनमें मेरा शामिल होना आवश्यक था। परंतु समय निकालकर पहले ही लौट आऊंगी, ऐसा खुद से वादा करके मैं पुत्र शशांक के साथ आयोजन स्थल पर पहुंची थी।
बनारस के जाम भरे रास्तों और टेढ़ी-घुमावदार गलियों से गुजरकर जब गंतव्य तक पहुंची, तो आदर्श सेवा इंटर कॉलेज के गेट पर ही सोच विचार पत्रिका के संपादक डॉ. नरेंद्र मिश्र और डॉ. वासुदेव ओबराय जी स्वागत करते हुए मिले। ससम्मान हाल में बैठी। मेरे साथ डॉ. मंजरी पाण्डेय भी थीं।
थोड़ी ही देर में सुप्रसिद्ध कथाकार मिथिलेश्वर जी एवं डॉ. सुषमा मुनीन्द्र ने प्रवेश किया। सुषमा जी मेरे साथ आकर बैठीं। परिचय का आदान-प्रदान हुआ। वे बहुत ही शांत व सौम्य लगीं। हम कहानियों पर बातें कर रहे थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं उनकी कहानियां पढ़ती हूं। उन्होंने पूछा कि मेरी कहानियों में आपको क्या अच्छा लगता है? मैंने कहा — “सहजता।”
उन्होंने हमारे शहर जमशेदपुर के विषय में और साहित्यिक सृजन के विषय में जानना चाहा और जानकर संतुष्ट थीं।
मंच पर कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप-प्रज्वलन से हुई और डॉ. बृजेन्द्र नाथ मिश्र जी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। मंचस्थ अतिथियों को भी पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया।
इस विशेष अवसर पर लोकप्रिय वरिष्ठ कथाकार मिथिलेश्वर एकाग्र पर आधारित सोच विचार पत्रिका के नए अंक का लोकार्पण भी हुआ।
अंततः मेरा नाम मंच से पुकारा गया। कथाकार मिथिलेश्वर जी ने प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया और डॉ. जितेंद्र मिश्र तथा डॉ. मंजरी ने शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। तस्वीरें ली गईं।
सम्मान समारोह के अंत में मैंने अपनी कविता “दहलीज पर खड़ी औरत” सुनाई। हाल तालियों से गूंज रहा था। मैं अभिभूत थी और आभारी भी।
अपने संबोधन में मैंने जब कहा —
“बनारस की पुण्यभूमि को बनारस की बेटी का शत-शत प्रणाम।”
तो वाह एवं तुमुल ध्वनि से मेरा स्वागत हुआ। उन अविस्मरणीय पलों की ऊष्मा आजीवन अंतर्मन में बनी रहेगी।
-पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर
