सुनो स्त्री,
तुम मत लिखना कविता
उस पुरुष के लिए
जिसे शब्दों की गहराई नहीं,
बस ऊपरी अर्थ समझ आते हों।
जो हर पंक्ति को
सिर्फ़ सुनता हो,
महसूस न करता हो।
मत सौंपना उसे
अपने भीतर की वह भाषा
जो दर्द, धैर्य और प्रतीक्षा से बनी है।
क्योंकि कुछ लोग
शब्द पढ़ लेते हैं,
पर उनके पीछे खड़ी स्त्री को
कभी नहीं पढ़ पाते हैं।
तुम लिखो
अपने पक्ष में,
उन दिनों के पक्ष में
जब पूरी दुनिया के विरुद्ध
तुमने ख़ुद को संभाला था।
और अगर कभी प्रेम पर लिखो,
तो उस व्यक्ति के लिए लिखना
जो तुम्हारे कहे हुए से अधिक
तुम्हारे न कह पाने को समझे।
-नीना अंदौत्रा
