स्वार्थ में लिपटे रिश्ते,
ज्यादा देर नहीं टिकते।
देर सवेर,
सामने आती हकीक़त,
दिखावा बन जाता मुसीबत।
तराजू के ; दो पलड़े
बराबरी पर ही संम्हलें।
जब हथेलियाँ दो मिलती,
ताली तभी है बजती।
छीनकर किसी की खुशियाँ,
मुस्कान लबों पर नहीं सजती।
किसी करके हकतलफी,
गवांते अपना कभी न कभी।
देख कर दूजो की रोटी चुपड़ी
जो जलते,
बिना मेहनत किये,
क्या कभी फूलते फलते।
काम आती,
सदा अपनी ही कमाई,
कहावतों, किस्सों में
बातें यही समझाई।
देर सवेर ही सही,
लौट के कर्म वापस आते हैं।
न हो हिसाब किताब पूरा तो,
चुकाने बार बार आते हैं।
मुक्ती मिलती है तभी,
गुनाहों की जब मिलती है माफी।
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
