देर-सवेर

देर- सवेर अक्ल उनको अब आ गई है
जब हमने उनसे दूरियां बना ली हैं
पहले हरदम अकड़े अकड़े फिरते थे
छोटी-छोटी बात पे डाँटा करते थे
हर एक काम में कमी नजर आ जाती थी
जान हमारी साँसत में पड़ जाती थी
कितनी सेवा कर लो पर तारीफ नहीं
जीवन भर झिड़कियां हमें मिलती ही रहीं
जब मेरे जीवन की शाम आ गई है
अब शरीर में जान न कुछ भी रह गई है
कभी कभी जब चाय पिलाते हैं हमको
मैं कितना करती थी,समझ आ गई है
चलो पुरानी बातों को अब छोड़ो भी
देर-सवेर समझ उनको अब आ गई है।

-राधा गोयल

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