दूर रह कर भी नहीं जो टूटती है,
अनकही सी भावनाएं जोडती है,
दोस्ती अहसास की कच्ची कली है,
जो कहानी धडकनों में सोचती है।
दोस्ती एसी नदी है जिन्दगी की,
धार बन बहती रही हैं भावनाएं,
मन का सागर पा सके न दो किनारे,
लहर संग ढलती रही हैं कामनाएं।
साथ चलना है हमें सागर किनारे,
पर लहर के साथ हम बहने न पायें,
मिल न पायें हम,भले ही युग युगों तक,
रास्ते विश्वास के मिटने न पायें।
कल कभी तुम साथ आओ या न आओ,
मै अकेली ही चलूंगी कर्म पथ पर,
बस यही अहसास हो संबल हमारा,
तुम हमेशा ही मेरे अहसास में हो…….!
कह उठा सागर ‘समर्पण हूँ तुम्हारा,
दूर हो, फिर भी मगर -हर सांस में हो।
-पद्मा मिश्रा
