“गौरैया की प्यास”
नन्ही सी एक चिड़िया ,
रोज मेरे घर आती थी ,
बैठ खिड़की पर ,
मुझे कलरव रोज सुनाती थी,
कुछ रोज से उसका,
आना जाना बंद हुआ ,
कुछ रोज बाद जब लौटी ,
कलरव उसका मंद हुआ ।
बोली मुझसे हे मनुज ,
कैसे आऊं द्वार तेरे ,
यह गर्मी बड़ा सताती है ,
रखा नहीं एक पात्र भी जल ,
प्यास हमें भी तो लग जाती है ,
पेड़ भी कुछ चंद बचे ,
छांव भी न मिल पाती है?
सुनना तो चाहते तुम आवाज मेरी ,
व्यथा मेरी समझ न आती है?
तुम हम पर ,हम तुम पर निर्भर,
साथ तो देना होगा,
हम बेजुबान मांगे बस यही ,
एक पात्र स्वच्छ जल ,
रख दो बस यहीं कहीं ,
प्यास भी तृप्त होगी ,
तन को भी मिलेगी राहत।
तुम्हारी इच्छा ,हमारी जरूरत ,
दोनों ही पूरी होगी।
साथ हमारा तुम्हारा बना रहे तो ,
सुंदर यह दुनिया होगी ।
-सोनम लड़ीवाला
जयपुर (राजस्थान)
