शून्य उपस्थित जहाँ
वहाँ पर
शून्य नहीं मानव गतिविधियाँ !
लिपियाँ जहाँ-जहाँ अनुपस्थित
मौन वहाँ लिखता
धड़कन को
अनबोली, अनसुनी कथाएँ
रहीं बाँचती
हैं जीवन को
गूँगी आवाजें
दुहरातीं
ऊँचे सुर में शब्दावलियाँ !
अकस्मात् घटना से पहले
होते हैं
घटना के कंपन
मन के कहीं किसी कोने में
जाग रहे होते
हैं स्पंदन
होता है इतिहास
सभी का
सबकी होती हैं विस्मृतियाँ !
सूनेपन की ध्वनियों में भी
संकेतों के
सूत्र मिलेंगे
ऊँची पर्वतमालाओं के
तल के नीचे
पाँव हिलेंगे
जब नापेंगे
उम्र धरा की
बोलेंगी तब भूली तिथियाँ !
-जगदीश पंकज
