बीते वक्त में चौधरी राम रतन सिंह इलाके के जाने – माने किसान थे। उनका बहुत बड़ा परिवार है। उनके ख़ुद के चार बेटे और दो बेटियां हैं । वे सभी बच्चों का विवाह कर चुके हैं ।
एक बार चौधरी राम रतन सिंह को लगा कि अब परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी किसी एक बेटे को सौंप दी जाएं। यूं तो परंपरा के अनुसार यह हक बड़े बेटे का था लेकिन उनके दूसरे नंबर के बेटे ने चालाकी से यह जिम्मेदारी हथिया ली।
जैसे ही उसे यह जिम्मेदारी मिली, कुछ ही महीनों में उसने परिवार की बैंक में जमा राशि को अपने सैर- सपाटे में खर्च कर दिया। परिवार के लोगों से वह यही कहता रहा कि वह परिवार की बेहतरी के लिए यह सब कर रहा है।
खैर, फिर उसने अपने परिवार के खेत अपने एक खास मित्र को दे दिए। उसका कहना था कि इससे परिवार को खेती से जुड़े झंझटों से छुटकारा मिलेगा। परिवार के आलसी सदस्यों की सहमती उसे आसानी से मिल गई।
बहरहाल, ख़ुद वह दिन में तीन चार बार कपड़े बदलने लगा। अपने लिए उसने महंगी कार ख़रीदी और उसका एक मित्र कह रहा था कि उसका चश्मा भी एक लाख रुपये का है।
खैर, दो साल भी न बीते थे कि उनका परिवार कंगाली की दहलीज़ पर पहुंच चुका था। स्थिति को हाथ से निकलते देख आज सुबह उसने अपने परिवार के सदस्यों से आग्रह किया कि वे सादा खाना खाएं क्योंकि तेल से दिल की बीमारियों का ख़तरा रहता है। जेवर न ख़रीदें क्योंकि इधर आसपास चोरी की घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं। रोटी को प्याज के साथ खायें क्योंकि सब्जियों में किसान बहुत दवा छिड़कने लगे हैं।
आज शाम को सैर के वक़्त उसके पिता जी मिले तो बातचीत के दौरान वे मुझसे रुआंसे स्वर में बोले, ” शेखर बाबू, मेरी अक्ल न जाने कहां घास चरने गई थी जो मैं अपने बड़े बेटे के बजाय इस नालायक के झांसे में आ गया।”
-सुभाष चंद्र लखेड़ा
