हर गम को मुस्कुराते निभाती चली गई
मै फ़िक्र को जमाने से छुपाती चली गई
कोई भयानक ख्वाब जो आँखों में उतर ग्या
यादों के कारवा को खुद मिटाती चली गई
इक डोर से में खुद ब खुद चलती रही डगर
रिश्ता ये प्यार का…..मै निभाती चली गई
क्या कह रही ग़ज़ल देखो तों आज फिर
हर शेर को आइना में दिखाती चली गई
कुछ अनकहे अशआर भी मुझसे चिढ रहे
सुन रे! निविद क्यूँ पेच लडाती चली गई
-अपेक्षा पवन व्यास
