होती है मोहब्बत में कशिश,
दिले हालात जुबां बयां करती है।
मैं हमदर्द हूं प्यारी सखी उसकी,
जो हर दर्द बतलाती है।
छूटे मुड़े से हैं किताब-ए इश्क के पन्ने,
ये कौन है जो हमें हमारे बाद पढ़ता है।
निगाहें ढूंढतीं हैं उसका दीदार करने को,
जो चुपके से जज्बातों को सलाम करता है ।
मौन मोहब्बत की गिरफ्त में लेकर ,
उसकी सांसों पर अपना नाम लिखता है।
ऐ मालिक रहम कर उन पर,
जो सजदे करते तेरे दर पर।
है पाक मोहब्बत दोनों ओर,
निगाहें राह तकती हैं।
वरना बिना इश्क के कब?
निगाहें इंतजार करती हैं।
-सीता गुप्ता
दुर्ग छत्तीसगढ़
