दूर कहीं से रुनझुन पायल की हल्की
किन्तु मधुर कर्ण प्रिय आवाज सुनाई दी।
मन स्वत ही तुम्हारी और चला गया।
तुम्हें भी तो पसंद थी पायल की मधुर आवाज़।
मुझसे कहा करते थे ना कि पायल पहना
करों, मुझे तुम्हारे आस-पास होने का
अहसास होता है।और सुकून मिलता है।
आज वही आवाज सुनकर मन विचलित
हो गया।तुम नहीं हो। लेकिन मुझे तुम्हारे
होने का आभास है।
क्योंकि आज भी किसी किसी और
के पैरों से पायल के रुनझुन की आवाज
आने पर तुम्हारे हाथों का स्पर्श मेरे
पैरों पर महसूस हो रहा है।
साथ ही तुम्हारा मुस्कान भरा चेहरा
मैं अपलक निहार रही हुं।
तुमको वचन दिया था कि हर समय
अपने पैरो में पायल पहने रहूंगी
तो वह वचन आज भी निभा रही हुं।
बस उसमें से अब रुनझुन की
आवाज बन्द कर दी है मेंने।
-रजनी दवे
