पिता और पुल

नदी के दो किनारों के बीच

तना हुआ एक पुराना पुल

कभी अपने लिए कोई सफ़र नहीं चुनता…

उसके सीने से रोज़ गुज़रती हैं

अनगिनत ख़्वाहिशें,

दौड़ती हुई उम्मीदें

और नए आसमानों की तरफ़ जाती उड़ानें…

वह अपने मज़बूत कंधों पर

बिना किसी शिकायत के सब कुछ ढोता है।

पानी के तेज़ और ठंडे बहाव में

गहराई तक धँसे उसके पाँव

कभी काँपते नहीं,

ताकि उस पर से गुज़रते क़दम

कभी न लड़खड़ाएँ।

उसकी ज़ंग खाती लोहे की पसलियों

और दरकते हुए कंक्रीट में

जो एक ख़ामोश दर्द समाया है,

वह दरअसल उसका नेह है…

जो कभी आँसुओं की तरह

आँखों से नहीं बहता।

पिता बिल्कुल उस पुल की तरह होते हैं…

जो ख़ुद सारी उम्र

एक ही जगह ठहर जाते हैं…

और अपनी ही पीठ को रास्ता बनाकर

हमें हमारी मंज़िलों तक छोड़ आते हैं।

जब हम उस पार पहुँचकर

अपनी नई दुनिया में मगन हो जाते हैं,

तब भी वह पुराना पुल

हमें दूर तक जाते हुए देखकर…

अपनी जगह खड़ा,

भीतर ही भीतर चुपचाप मुस्कुराता है।

-आराध्या द्विवेदी

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