मटमैले पानी की लहरें,
सहता जैसे पिता का सीना।
दुखों के हर थपेड़े खाकर,
सिखाया हमें शान से जीना।
तट पर खड़े भव्य ये महल,
पिता के स्वाभिमान से हैं।
हर मुश्किल को रोक के रखते,
घर के वो निगहबान से हैं।
ऊपर नीला-सफेद जो अंबर,
पिता की छत का साया है।
ठंडी बहती हुई पुरवाई,
उनका ही वात्सल्य और माया है।
धुंधले पानी के दर्पण में,
दिखती उनकी सतरंगी परछाई।
रुई जैसे सफेद बादलों ने,
पिता की ही सौम्यता पाई।
-ताहीर हुसैन
मधेपुरा (बिहार)
