पोर-पोर पीर में पगा
प्रीति के प्रमाण हो गये
गीत थे ग़ज़ल बने कभी
बाँसुरी की तान हो गये
जो बहुत करीब आ के भी
दूर-दूर , दूर ही रहे
बादलों की सघन छाँव में
हम अलाव की तरह जले
देहरी के स्वस्ति गान भी
राह की थकान बो गये
रूठने लगीं हैं आहटें
जीवन के विगत सत्र की
बाँचते थे जब इबारतें
चाँदनी से लिखे पत्र की
बीते पल वर्तमान के
रेशमी वितान हो गये
धुल न जाँय सुधि के शिलालेख
आँसुओं को मोड़ दे दिया
बिखरती हुई ऋचाओं को
साधना का क्रोड़ दे दिया
आहों के अनमने चलन
आरती का गान हो गये
-डॉ. मधु प्रधान
कानपुर
