“गौरैया की प्यास”
विलक्षण देदीप्यमान ऊर्जावान।
गौरवांवित करती घर-आंगन।
फुदक-फुदक जब दाना चुगती।
प्रफुल्लित कर देती सबका मन।
विलुप्तप्राय यदा-कदा दिखना।
कल्याण प्रतीक सबका कहना।
आज दिग्भ्रमित समाज आचार।
भूल रहा तुम्हारा जीवन आकार।
कभी-कभार दाना पानी रखकर।
पुण्यकर्म दिया नाम बताकर।
काट रहा प्रकृतिअनमोल उपहार।
ईंट कंक्रीट से बना रहे घर-द्वार।
फुनगी ऊपर बैठ चहचहाती गौरैया।
उतर आती आंगन सब लेते बलैया।
अपनापन और विश्वास मनोभाव साथ।
विषाक्त पानी पात्र रखते हाथ।
बूंद बूंद पानी को तरसती गौरैया।
पानी पात्र पर बैठ सोच रही गौरैया।।
-प्रेम सिंह “काव्या”
छत्तीसगढ़
