(दोहावली)
(१)
नयनों में संकोच है,अधरों पर विस्तार।
मन के भीतर खिल रहे,चाहत के कचनार॥
(२)
दृग-अंचल की पाल पर,सौ-सौ बातें खोल।
नयनों ने सब कह दिया,अब क्या बोलें बोल॥
(३)
चुप्पी भी उच्चारती,प्रियता का अनुनाद।
मेरे उर संवेद का , तुम ही हो अनुवाद॥
(४)
रदपट ने आधा कहा,आधा रहा उधार।
नयनों ने पूरा किया,अवगुंठित स्वीकार॥
(५)
एक बसंती चंद्र हो,अधरों पर इक बात।
मैं गूँथूँ फिर केश में,तुम बनना परिजात॥
(६)
चाँद झुका टहनी तले,बिखरी मंद बयार।
तुम सँग बैठी तब लगा,सारा जग साकार॥
(७)
अलकों से बेला गिरे,कंपित अंतर-तार।
लज्जा बन ठहरा रहा,तन-लतिका पर भार॥
(८)
बन सुगंध पसरो पिया,भर दो तुम निज-व्योम।
साँसों के हर बंध में,बसो रोम में सोम॥
(९)
प्रीत-परस का क्या कहूँ,कैसा होता वार।
छूते ही मधु सा हुआ,विष का भी व्यवहार॥
(१०)
साजन ढलकर गीत में,करें प्रकट अनुराग।
सजनी ने दोहा रचा,कह डाला सब भाग॥
-प्रेरणा पुरोहित मंत्री
