रात भर मैंने मिलन के गीत गाए,
पर न मन के मीत,अब तक लौट पाए !
मैं निशा में था तुम्हारा पथ निरखता,
चांद तो मुझसे बहुत ही दूर था प्रिय.
सह न पाया मैं हृदय की पीर चुभती,
क्योंकि मेरा प्यार भी मजबूर था प्रिय,
पूछ लेना तुम अरे इन तारकों से,
कौन, बैठा रात भर दीपक जलाए ?
पर न मन के मीत,अब तक लौट पाए !
पूछती है रजनिगंधा अब बिहंसकर,
कौन निष्ठुर मीत तुझको छल गया है ?
कौन है वह सीप में दृग की अचानक,
एक मोती की तरह जो ढल गया है ?
पूछ लेना तुम निशा के हर प्रहर से,
कौन बैठा रात भर, पलकें बिछाए ?
पर न मन के मीत,अब तक लौट पाए !
रात भर बारात शलभों की चिता पर,
प्रणय का उपहार लेकर जल गई प्रिय.
मिलन की मधु चाह मेरी भी मचल कर,
वेदना का ताप सहकर जल गई प्रिय !
पूछ लेना दीप की जलती शिखा से,
कौन बैठा रात भर, उर लौ लगाए ?
पर न मन के मीत, अब तक लौट पाए !
बीन के ये तार उन्मादक थिरक कर,
रात भर आवाज़ देते रह गए प्रिय !
गीत के स्वर कंठ तक आए मगर फिर,
अश्रु बनकर लोचनों में बह गए प्रिय!
पूछ लेना तुम विकल उस रागिनी से,
कौन, जिसने रात भर ही गीत गाए?
पर न मन के मीत, अब तक लौट पाए!
-प्रमोद मिश्र “निर्मल”
