मृदु स्नेह!
कैसी हो मेरी अंतश्चेतना? आज बरसों बाद तुम्हारे लिये वक्त निकाल पाई। जीवन के आपाधापी में दौड़ते-भागते हुए भी तुम्हारा भोला मन सदैव मेरे भीतर मचलता रहा। पर उसकी मासूमियत को चाहकर भी दुलरा नहीं पाती। पता है क्यों? क्योंकि यथार्थ-जीवन तुम्हारी कल्पना के वितान पर रूई के फाहे- सा तैरता नहीं रहता,फूलों की पँखुड़ियाँ उसके रास्ते पर बिछी नहीं रहतीं। दरअसल अक्सर पथरीली -कंटकित, ऊबड़-खाबड़ राह में बचते-बचाते कभी पगडंडी तो कभी रास्ता,जो भी मिल जाय,उसपर निरंतर चलते रहने का नाम ही ‘जीवन’ है। जीवन की आधारभूत जरूरत पूरी करना अधिकतर लोगों के लिए जंग जीतने का एहसास है। पूनम, मुझे याद है कि,तुम समाज के के लिये कुछ सकारात्मक करने को सदैव इच्छुक रही। शायद इसी वजह से आज भी अगर कोई वंचित-विवश दिख जाता है तो, उसकी समस्याओं के प्रति मैं संवेदनशील हो जाती हूँ। अपने इस स्वभाव के कारण बहुत बार बेवकूफ बन जाती हूँ । आज के परिप्रेक्ष्य में अधिकतर मानवीय संबंध ठंडे हो गयें हैं। पर, मैं आज भी संबंधों को महत्व देती हूँ और धोखे भी खाती हूँ। कभी-कभी किन्हीं रिश्तों को बचाने के लिए जान-बूझ कर बेवकूफ बन जाना या जो गलती की भी नहीं, उसके लिये क्षमा भी माँग लेती हूँ और स्वयं की मूर्खता के लिए खुद से परिहास भी कर लेती हूँ। उस समय ऐसा लगता है कि,वह पूनम ‘ मैं’ नहीं, ‘तुम’ हो, जो निश्छल भाव से यह मानती है कि, प्रत्येक संबंध ईश्वर निर्मित होते हैं और इसलिए वह ऊपर से भले ही शुष्क दिखें, पर कभी न कभी निर्मल भाव से भर उठेंगे। कहते हैं न, जहाँ चाह, वहाँ राह! मेरे जीवन में ऐसे भी कुछेक संबंध हैं, जो हमारी तरह ही सोचतें हैं, मनुष्य-मात्र पर विश्वास करतें हैं।
जानती हो पूनम, नारी जीवन पर तुम्हारा गर्व करना आज भी मुझे उत्साहित करता है।… हाँ-हाँ बाबा! पंत की वे प्यारी पंक्तियाँ मुझे आज भी याद है–
“सकल ऐश्वर्यो की संधान/देवि,माँ, सहचरी प्राण!”
सच री,हम नारियाँ अद्भुत हैं। आज हम नारियाँ जीवन के हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रहीं हैं,अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही है। पर…दु:ख की बात है कि, आज हम सुरक्षित नहीं हैं। तुम्हारे भोले मन को यह जानकर ठेस पहुँचेगी कि, वीरभोग्या वसुंधरा भारत-भूमि, आज ऐसे का पुरुषों का बोझ ढो रही है जो,नन्हीं कलिकाओं को क्षत-विक्षत कर झाड़ियों में फेंक देतें हैं। ऐसे परिवेश में कभी-कभी वर्तमान समाज से विश्वास उठने लगता है। एक कड़वी सच्चाई से अवगत कराना चाहूँगी कि, आज का समाज विसंगतियों के मध्य रोज अखबारों की सुर्खियाँ बटोरता है। सामाजिक समस्याओं से निपटने के लिए लोग किसी प्रकार की जागरूकता अभियान चलाने से बेहतर किसी राजनैतिक-दल के लंबरदार बनकर अपना भला करने में दिलचस्पी रखते हैं। राजनीति,आर्थिक,सामाजिक, धार्मिक, सभी क्षेत्रों के अपने कई संस्थाएँ हैं। यों कहें कि सभी क्षेत्र में अनेक मठ और अनेक मठाधीश बन गये है। सभी मिलकर अभाव, बीमारी और लाचारी से ग्रस्त तबके का दोहन करतें हैं। एकता का अभाव उन्हें सामर्थ्यहीन बना उनके जीवन को अभिशप्त कर रहा है। ऐसे में जो सही मायने में समाज के प्रति अपनी जबाबदेही निभाना चाहते हैं, उन्हें भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
तुम्हें लग रहा होगा कि, इतने दिनों बाद याद भी किया तो अपने विक्षुब्ध मन की भड़ास निकाल रही है। पर नहीं रे, मैंने कहा न कि, तुम मेरे भीतर मिलती रहती हो। और जहाँ तुम्हारा भोला-निश्छल मन अपनी अक्षुण्ण सकारात्मक जिजीविषा लिये हो,वहाँ कभी नकारात्मक सोच प्रभावी हो सकती है? नहीं न!
यथार्थ की पथरीली जमीन पर मेरी आशाएँ पथराई नहीं है, वह तो यहीं से तुम्हारे कल्पना के वितान में तिरते रूई के फाहों से संजीवनी पाती, भावी पीढ़ी के निरभ्र आँखों में पलते स्वप्न को खाद-पानी देकर उसे भविष्य के लिए पोषित कर रही है। जहाँ कभी न मलिन होनेवाला प्रेम होगा, समाज बिना किसी भेदभाव के संबंधों की गर्मजोशी में विकास के नये सोपान चढ़ता रहेगा, बेटे और बेटियाँ, संतान कहे जायेगें, नर-नारी सम-श्रेष्ठ होंगें और… ‘मैं’ और ‘तुम’
के भाव-विचार एकत्र होकर पल्लवित-पुष्पवित होंगें।
कितनी बातें है, जो तुमसे कहना चाहती हूँ, स्वयं को बाँटने चाहतीं हूँ किन्तु, ऊपर नीले गगन में कार्तिक पूनो के आने की तैयारी में चाँद, पुलकित डोल रहा है और मेरी खिड़की पर आकर रात्रि के अंतिम प्रहर का संकेत दे रहा है।मैं ताजगी से भरी सूरज की ऊष्मा महसूस करने की चाहत में अब तुमसे आज्ञा चाहूँगी, तुम्हारा चपल-चंचल भोला मानस नित नयी ऊर्जा से गुंम्फित हो, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ-
तुम्हारी,
पूनम
-पूनम कतरियार
